Swapnesh Tiwari’s Blog

July 26, 2009

ये गरमी गरमा-गरम सी है…

Filed under: Poems — swapnesh27 @ 5:35 am
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“ये गरमी गरमा-गरम सी है, है गरमा गरम ये गरमी,
झुलसाती जलाती इठलाती, ना बरते कहीं पे नरमी,
ये गरमी गरमा-गरम सी है, है गरमा गरम ये गरमी|

हर ओस की बूँदें भाप बनीं, और घांस लगे काँटों से,
हर फूल और कलियाँ झुलस गयीं, गरमी के बरसते चांटों से,
हर भँवरे भू-भू भाग रहे, ढूंढें ठंडक और नरमी,
पर ये गरमी गरमा-गरम सी है, है गरमा गरम ये गरमी|

हर नल और गले हैं सूख रहे, सब मांगें तर-तर पानी,
धूप के मस्त थपेडों से सबको, याद आ गयीं नानी,
हर इन्सां बेबस मजबूर हुए, क्या धर्मी क्या दुष्कर्मी,
झुलसाती इठलाती ये गरमी, ना बरते कहीं पे नरमी|

ये गरमी गरमा-गरम सी है, है गरमा गरम ये गरमी,
झुलसाती जलाती इठलाती, ना बरते कहीं पे नरमी,
ये गरमी गरमा-गरम सी है, है गरमा गरम ये गरमी|”

July 15, 2009

गर्मी की छुट्टियाँ

Filed under: Poems — swapnesh27 @ 2:52 pm
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“आँखों में मस्ती से भरा एक सपना नया खिल जाता है
जब भी गर्मी की छुट्टियों का, नाम कान में आता है

सुबह में उठना, ब्रश ना करना, बस शुरू कर देना वीडियो गेम
साथ में गिलास हो गरम दूध का, और ब्रेड हो जिस पर लगा हो जैम
बस फिर कोई ना रोके, कोई ना टोके, हम आभासी वीरों को
दुनिया को हमें बचाना है, झुलसा के दुश्मन के जज़ीरों को…
पर ऐन-वक़्त पे बिजली के जाने से गुस्सा आता है
और दुसरे ही पल में हमको एक जोश नया मिल जाता है
आँखों में मस्ती से भरा एक सपना नया खिल जाता है
जब भी गर्मी की छुट्टियों का, नाम कान में आता है

अपनी छोटी-छोटी कारों से हम रेस बहुत लगाते हैं
पर टाइम से ना नहाओ तो पापा, कस के डांट लगाते हैं
नहाने धोने के बाद में खाना दबा कर ठूंसो बस
फिर पियो ठंडा सा रूह-अफजा या मुंह में डालो ठंडा खस
उसी समय पे मामा-चाचा के आने से मज़ा बढ़ जाता है
और साथ में उनके कैरम खेल कर टाइम पास हो जाता है
आँखों में मस्ती से भरा एक सपना नया खिल जाता है
जब भी गर्मी की छुट्टियों का, नाम कान में आता है

मम्मी के हाथों से बनी लस्सी जादू कर जाती है
और साथ में छनते पकौडों से, भूख और बढ़ जाती है
छुट्टियों में बढ़ जाता है, हम बच्चों के सिर पर कितना काम
दिन भर खेलो, दिन भर खाओ, मिलता नहीं एक पल को आराम
इतने पर भी मिला हुआ होम-वर्क, कस के कहर गिराता है
उनको पूरा करते समय, स्कूल वालों पर गुस्सा आता है
आँखों में मस्ती से भरा एक सपना नया खिल जाता है
जब भी गर्मी की छुट्टियों का, नाम कान में आता है

मम्मी-पापा जब छुट्टियों में घुमाने की प्लानिंग करते हैं
तो “कहाँ जायेंगे?” इस बात पर, हम बैठ कर घंटों लड़ते हैं
घूमने की सारी तैयारियों में हम दिन भर की मेहनत लगाते हैं
और फिर उसके बाद में हम कैलेंडर पे क्रॉस लगाते हैं
घूमने-फिरने की बात पर हमको मज़ा बहुत ही आता है
पर शाम के सारे कार्टून छूटने का दर्द भी हमें सताता है
आँखों में मस्ती से भरा एक सपना नया खिल जाता है
जब भी गर्मी की छुट्टियों का, नाम कान में आता है

पापा-मम्मी टेंशन में हैं, ऐसा हमको लगा था कल
पता चला है कि पापा की सारी छुट्टियाँ हो गयीं कैंसल
साथ में कुछ पैसों की परेशानी को लेकर भी चर्चा है
हमारी सारी जिद्द की वजह से, बढ़ गया कितना खर्चा है
पर तभी शाम को ऑफिस से पापा का फ़ोन आता है
सारी टेंशन अब दूर हो गयीं, इस बात का हमको वादा है
आँखों में मस्ती से भरा एक सपना नया खिल जाता है
जब भी गर्मी की छुट्टियों का, नाम कान में आता है

अब जब लौट के आ गए हैं हम सब गर्मी की छुट्टियों से
बचे हुए दिन छुट्टियों के अब फिसल रहे हैं अपनी मुट्ठियों से
हर बीते दिन की यादें तड़पाएँगी अगले कुछ दिन तक
और वीडियो गेम की आवाजें भी हलके से दे जायेंगी दस्तक
इतने दिनों के बाद में स्कूल जाने से मन घबराता है
पर बिछडे दोस्तों से मिलने की बात पे मन हर्षाता है
आँखों में मस्ती से भरा एक सपना नया खिल जाता है
जब भी गर्मी की छुट्टियों का, नाम कान में आता है”

 

 

“श्री भैरव जी की जय”

July 10, 2009

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Filed under: Uncategorized — swapnesh27 @ 4:52 am

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July 9, 2009

आतंकवादी पधारे मोरे अंगना…!

Filed under: Poems — swapnesh27 @ 6:30 am
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“आतंकवादी पधारे मोरे अंगना, आतंकवादी पधारयो म्हारे देस,
म्हारे प्यारे गुलसन को जरावें, ये सब बदल-बदल कर भेस,
आतंकवादी पधारे मोरे अंगना, आतंकवादी पधारयो म्हारे देस|

उनके रहन-सहन के खातिर, छाड़ दी हमने घाटी है,
उनके संगी-साथी बुलवाए, जो कहाते, उल्फा- नक्सलवादी हैं,
उनके भव्य स्वागत को पधारे हुए हैं देस के सारे प्रदेस,
आतंकवादी पधारे मोरे अंगना, आतंकवादी पधारयो म्हारे देस|

माटी पर जब बूँद गिरे तो महके वो बारूद के जैसे,
उनकी असीम अनुकम्पा से, अब फसल भी लगे हथियार के जैसे,
सीने पर वो मूंग दरे हैं, हर अंग वो पहुँचावे हैं ठेस,
आतंकवादी पधारे मोरे अंगना, आतंकवादी पधारयो म्हारे देस|

उनकी अद्भुत हुंकार से, एकदम ही घबरा जावे हैं हम,
उनकी गोलियों कि टंकार से, न जाने कहाँ निकल जावेगा दम,
हर गली में उनका खौफ है पसरा, चाहे हो दिल्ली या कोई प्रदेस,
आतंकवादी पधारे मोरे अंगना, आतंकवादी पधारयो म्हारे देस|

उनको बैठ के पाल रहे हैं इस देस के सारे संविधानकारी,
मानवता को वो काट रहे हैं जैसे काटे कोई सब्जी-तरकारी,
इन अतिथियों ने इस देस को लूटा, पर बना ना इन पर कोई केस,
आतंकवादी पधारे मोरे अंगना, आतंकवादी पधारयो म्हारे देस|

“अतिथि देवो भवः”, ये पंक्ति हम कहते हैं ज़रूर,
पर जो हमसे करे दुस्मनी, तोड़ देवें हम उसका गुरूर,
हम सब से वो बच ना सकेंगे, जाकर उनसे कह दो ये संदेस,
क्योंकि अब वो वक़्त है आ गया जब,
आतंकवादी मुक्त हो मोरा अंगना, आतंकवादी मुक्त हो म्हारा देस|”

July 8, 2009

एक सरकारी दफ्तर…

Filed under: Poems — swapnesh27 @ 5:26 am
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“कोई उड़ाए मक्खी-मच्छर, कोई उड़ाए कबूतर,

एक प्यारी सी जगह है ये है, एक सरकारी दफ्तर|

 

करने को कई काम हैं फिर भी काम नहीं करने को,

अपने किस्से गाते रहना, यही काम बड़ा है उनको,

कोई सुने मैच की कमेंट्री, कोई मेंढक की टर-टर,

एक प्यारी सी जगह है ये है, एक सरकारी दफ्तर|

 

जब भी आये फाइल मेज पर, सरका दें उसे हर पल,

जम्हाते, मुस्काते, ऊंघते, दाँत दिखाएं पल-पल,

बड़े साब का आना सुनकर, होते पसीने से तर-तर,

एक प्यारी सी जगह है ये है, एक सरकारी दफ्तर|

 

गलती से जब कलम हिले और हो जाता इनसे काम,

तो फ़ौरन मुंह में पान डाल सब मांगे अपना इनाम,

बिना इनाम अपने प्रार्थी को खूब कटायें चक्कर,

एक प्यारी सी जगह है ये है, एक सरकारी दफ्तर|

 

जब भी उनसे पूछो कि, “क्यों लेते भैया घूंस”

बड़े ताव से बोलें सब, “क्या खाएं हम घास-फूस?…

…हम भी चाहते नया सा बंगला और एक अच्छी सी मोटर”,

एक प्यारी सी जगह है ये है, एक सरकारी दफ्तर|

 

अपना दुखड़ा सुनाते हैं सब गा कर लम्बा गान,

“हमें भी ऊपर देना पड़ता, बचाने को अपनी जान…

…ना दें तो, सब मिलकर नौकरी खा जायेंगे छक-कर”,

एक प्यारी सी जगह है ये है, एक सरकारी दफ्तर|

 

हर जगह है फैली लाचारी, ऊपर से रिश्वत की मारामारी,

हर कोई है इसकी चपेट में, फिर, क्या नेता, क्या अधिकारी,

इन सब के बीच में पिसता है, आम इंसान अब घुन बनकर,

बस एक अच्छी सी जगह है बनकर, रह गया सरकारी दफ्तर|”

May 11, 2009

फिर से मौत बुला रही है…!

Filed under: Poems — swapnesh27 @ 11:53 am

“फिर से मौत बुला रही है, अपने कातिल आगोश में,
ऐ इंसानियत के रखवालों, फिर से आ जाओ जोश में|

गुलशन में खिले हुए फूलों पर खून का है रंग चढ़ा,
फिर से खिलखिलाती वादी में सन्नाटा हर ओर बढ़ा…
रौनकनशीं उन गलियों में फिर से कोई अनजान खड़ा,
बेकसूरों के बहते खून पे जिसने सरहदों का नाम मढ़ा…
खौफ के इस मंज़र मैं बस, बंदूकें हैं होश में,
ऐ इंसानियत के रखवालों, फिर से आ जाओ जोश में|

सरपरस्तों की वो दुनिया, न जाने अब किस ओर है,
मौकापरस्तों का अब देखो, हर ओर कितना ज़ोर है…
जिनको समझे हम नेहरु-गाँधी, वो निकले कोई और हैं,
मुल्क को बचाने से पहले, कुर्सी बचाने की होड़ है…
वो बस पैसे वोट और ताकत से आते हैं होश में,
इसलिए इंसानियत के रखवालों, फिर से आ जाओ जोश में|

फिर से मौत बुला रही है, अपने कातिल आगोश में,
ऐ इंसानियत के रखवालों, फिर से आ जाओ जोश में|”

 

Hello world!

Filed under: Uncategorized — swapnesh27 @ 10:46 am

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