“आँखों में मस्ती से भरा एक सपना नया खिल जाता है
जब भी गर्मी की छुट्टियों का, नाम कान में आता है
सुबह में उठना, ब्रश ना करना, बस शुरू कर देना वीडियो गेम
साथ में गिलास हो गरम दूध का, और ब्रेड हो जिस पर लगा हो जैम
बस फिर कोई ना रोके, कोई ना टोके, हम आभासी वीरों को
दुनिया को हमें बचाना है, झुलसा के दुश्मन के जज़ीरों को…
पर ऐन-वक़्त पे बिजली के जाने से गुस्सा आता है
और दुसरे ही पल में हमको एक जोश नया मिल जाता है
आँखों में मस्ती से भरा एक सपना नया खिल जाता है
जब भी गर्मी की छुट्टियों का, नाम कान में आता है
अपनी छोटी-छोटी कारों से हम रेस बहुत लगाते हैं
पर टाइम से ना नहाओ तो पापा, कस के डांट लगाते हैं
नहाने धोने के बाद में खाना दबा कर ठूंसो बस
फिर पियो ठंडा सा रूह-अफजा या मुंह में डालो ठंडा खस
उसी समय पे मामा-चाचा के आने से मज़ा बढ़ जाता है
और साथ में उनके कैरम खेल कर टाइम पास हो जाता है
आँखों में मस्ती से भरा एक सपना नया खिल जाता है
जब भी गर्मी की छुट्टियों का, नाम कान में आता है
मम्मी के हाथों से बनी लस्सी जादू कर जाती है
और साथ में छनते पकौडों से, भूख और बढ़ जाती है
छुट्टियों में बढ़ जाता है, हम बच्चों के सिर पर कितना काम
दिन भर खेलो, दिन भर खाओ, मिलता नहीं एक पल को आराम
इतने पर भी मिला हुआ होम-वर्क, कस के कहर गिराता है
उनको पूरा करते समय, स्कूल वालों पर गुस्सा आता है
आँखों में मस्ती से भरा एक सपना नया खिल जाता है
जब भी गर्मी की छुट्टियों का, नाम कान में आता है
मम्मी-पापा जब छुट्टियों में घुमाने की प्लानिंग करते हैं
तो “कहाँ जायेंगे?” इस बात पर, हम बैठ कर घंटों लड़ते हैं
घूमने की सारी तैयारियों में हम दिन भर की मेहनत लगाते हैं
और फिर उसके बाद में हम कैलेंडर पे क्रॉस लगाते हैं
घूमने-फिरने की बात पर हमको मज़ा बहुत ही आता है
पर शाम के सारे कार्टून छूटने का दर्द भी हमें सताता है
आँखों में मस्ती से भरा एक सपना नया खिल जाता है
जब भी गर्मी की छुट्टियों का, नाम कान में आता है
पापा-मम्मी टेंशन में हैं, ऐसा हमको लगा था कल
पता चला है कि पापा की सारी छुट्टियाँ हो गयीं कैंसल
साथ में कुछ पैसों की परेशानी को लेकर भी चर्चा है
हमारी सारी जिद्द की वजह से, बढ़ गया कितना खर्चा है
पर तभी शाम को ऑफिस से पापा का फ़ोन आता है
सारी टेंशन अब दूर हो गयीं, इस बात का हमको वादा है
आँखों में मस्ती से भरा एक सपना नया खिल जाता है
जब भी गर्मी की छुट्टियों का, नाम कान में आता है
अब जब लौट के आ गए हैं हम सब गर्मी की छुट्टियों से
बचे हुए दिन छुट्टियों के अब फिसल रहे हैं अपनी मुट्ठियों से
हर बीते दिन की यादें तड़पाएँगी अगले कुछ दिन तक
और वीडियो गेम की आवाजें भी हलके से दे जायेंगी दस्तक
इतने दिनों के बाद में स्कूल जाने से मन घबराता है
पर बिछडे दोस्तों से मिलने की बात पे मन हर्षाता है
आँखों में मस्ती से भरा एक सपना नया खिल जाता है
जब भी गर्मी की छुट्टियों का, नाम कान में आता है”
“श्री भैरव जी की जय”
Bahut hi umda kavita likhi hai aapne, sach mein mujhe to apna bachpan yaad aa gaya.
Comment by Aditya — July 23, 2009 @ 5:30 am |
good.
Comment by shyam narayan pandey(emp. of design tiwari) — October 28, 2009 @ 12:54 pm |