“ये गरमी गरमा-गरम सी है, है गरमा गरम ये गरमी,
झुलसाती जलाती इठलाती, ना बरते कहीं पे नरमी,
ये गरमी गरमा-गरम सी है, है गरमा गरम ये गरमी|
हर ओस की बूँदें भाप बनीं, और घांस लगे काँटों से,
हर फूल और कलियाँ झुलस गयीं, गरमी के बरसते चांटों से,
हर भँवरे भू-भू भाग रहे, ढूंढें ठंडक और नरमी,
पर ये गरमी गरमा-गरम सी है, है गरमा गरम ये गरमी|
हर नल और गले हैं सूख रहे, सब मांगें तर-तर पानी,
धूप के मस्त थपेडों से सबको, याद आ गयीं नानी,
हर इन्सां बेबस मजबूर हुए, क्या धर्मी क्या दुष्कर्मी,
झुलसाती इठलाती ये गरमी, ना बरते कहीं पे नरमी|
ये गरमी गरमा-गरम सी है, है गरमा गरम ये गरमी,
झुलसाती जलाती इठलाती, ना बरते कहीं पे नरमी,
ये गरमी गरमा-गरम सी है, है गरमा गरम ये गरमी|”